आसन, मुद्रा एवं प्राणायाम

आसन, मुद्रा एवं प्राणायाम 

योगशाश्र में आसन और मुद्राओं के गुणों का काफी वर्णन है। सिर्फ अकेले सर्वाज्जासन के लिये ही कहा गया है कि इसके अभ्यास से सभी रोग जैसे–अपचन, अम्लता, अर्श, प्लीहा के रोग, कुष्ठट, यकृत के रोग, श्वास, राजयक्ष्मा, स्नायु-दौर्बल्य, मधुमेह, प्रदर, गर्भाशय का स्थान भ्रष्ट होना आदि दूर होते हैं। इसी प्रकार उड़ीयानब्ध मुद्रा की प्रशंसा में भी कहा गया है कि यह सभी प्रकार की शारीरिक व्याधियों को दूर करने में समर्थ है। इसे ‘मृत्युमातंगकेशरी’ के नाम से भी पुकारा गया है। अन्य आसन एवं मुद्राओं की भी इसी प्रकार प्रशंशा की गई है। वास्तव में यह अतिशयोक्ति नहीं है। हमें याद रखना चाहिये कि एक आसन या मुद्रा के अभ्यास से कोई भी रोग दूर होनेवाला नहीं है अतएवं यह आंशिक मदद ही है। 

किसी एक अंग या ग्रन्थि के दोषी होने से ही कोई बीमारी उत्पन्न नहीं हो सकती है। रोग तभी उत्पन्न होते हैं जब कि शरीर की प्राय: सभी ग्रन्थियाँ या रक्तवाहिनी नसें दोषी हों। जब एक ग्रन्थि अपने सहयोगी की कमी की पूर्ति नहीं ‘कर पाती तब सम्मिलित प्रयास भी विफल हो जाते हैं, सभी ग्रन्थियां रोगी होकर बेकार हो जाती हैं और रोग के कीटाणु एकत्रित होने लगते हैं, संख्या में बढ़ते हैं एवं शरीर में चारों तरफ फैल जाते हैं। 

अतएवं कोई भी बीमारी स्थानविशेष को प्रभावित नहीं करती है बल्कि सारे शरीर के संकट की दछोतक है। यही कारण है कि कोई भी एक आसन या मुद्रा एक बीमारी को पूर्णरूपेण दूर नहीं कर पाती। इन्द्रग्न्थि  (Thyroid) स्वाभाविक रूपेण रोगी हो जायगी अगर वायु की प्रन्थियाँ (फुस्फुस, हृदय आदि) रक्त शुद्ध करने और ग्रन्थियों के लिये पोषक तत्व के रूप में बदलने के लिये समुचित मात्रा में आवश्यक ऑक्सीजन नहीं देंगी। इसके फलस्वरूप अम्मि की ग्रन्थियों (जैसे–यकृत, प्लीहा, अग्न्याशय आदि) में भी कमजोरी हो जायेगी। इसके कारण कई प्रकार के रोग हो सकते हैं। शरीर के सभी अवयव आपस में एक दूसरे ब्ै जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को सक्रिय सहयोग देते रहते हैं। अतएब जब तक शरीर के सभी अंग ठीक प्रकार से कार्य न करने लग जायें, रोग का निर्मूल होना असम्भव है। 

अगर ग्रन्थियों के सातों केन्द्र (अर्थात महतग्रन्थि, अहंग्रन्थि, नभोग्रन्थि, वायुग्रन्थि, अग्रिग्रन्थि, वरुणग्रन्थि एवं पृथ्विग्रन्थि) भली प्रकार कार्य करने लगें, शरीर के सभी भाग, स्नायु, नाड़ी, मसल, कोष, तन्तु आदि सभी ठीक प्रकार कार्य करेंगे तभी रोग होने की सम्भावना दूर होगी। 

हमने इस अध्याय मैं उन्हीं आसन, मुद्रा एवं प्राणायाम, धौति और वस्ति आदि की चर्चा की है जिनसे इन ग्रन्थियों को बल मिलता है और रोग दूर होते हैं। इसमें नाममात्र का संशय नहीं कि इन सिद्धान्तों एवं तरीकों का पात्तन को रोगमुक्त जीवन, सुदृढ़ स्वास्थ्य एवं. शतायु होने का वरदान मिलेगा। 

आसन और मुद्राएँ 

आसन 

आसन दो प्रकार के होते हैं–ध्यानासन एवं स्वास्थ्यासन। प्रथम प्रकार के आसन वे होते हैं जिनकी मुद्रा ध्यानस्थ होती है। ये पूर्ण स्वास्थ्य के लिये उपयोगी हैं। बे आसन ध्यान आदि आरामपूर्वक करने के लिये उपयोगी हैं। ‘ध्यान’ आत्मन्नान की ओर जाने वाली पहली सीढ़ी है। 

शारीरिक स्वास्थ्य के लिये उपयोगी आसनों का विशिष्ट उद्देश्य है शरीर को स्वस्थ एवं स्नायु-मांसपेशिओं को सबल रखना एवं उसको रोग से रक्षा करना। यहाँ हमने सिर्फ उन्हीं आसनों की चर्चा की है जिनका उद्देश्य स्वास्थ्य रक्षा है। 

मुद्राएं-

शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिये आवश्यक बहुत से मुद्राएँ हैं। रीढ़ की हड्डी को मुलायम एवं लचीली बनाने के लिये स्नायु एवं मसल को सुदढ़ बनाये रखना आसनों का मुख्य उद्देश्य है, जब कि मुद्राएँ ग्रन्थियों को स्वस्थ एवं ठीक प्रकार कार्य करने योग्य अवस्था में बनाये रखती है। स्वास्थ्य रक्षा में, स्‍नायु एवं मसल की अपेक्षा इन ग्रन्थियों का दायित्व अधिक है। इनमें से वे ग्रन्थियाँ अधिक महत्वपूर्ण हैं जिनसे रसमय पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इन ग्रन्थियों से प्राप्त होनेवाले रस के अभाव में शरीर निर्बल, अशक्त और रोगी होकर अकाल मृत्यु को प्राप्त करता है। यही रस रक्त में मिलकर शरीर को सुन्दर स्वस्थ बनाता है एवं उसकी रोग से रक्षा करता है। इस रक्त का सार पदार्थ शरीर के सभी यन्त्रों को कार्य करे में सहायता पहुँचाता है। 

अतएव सुदृढ़ शारीरिक स्वास्थ्य एवं मस्तिष्क संतुलन के लिये मुद्राओं के अभ्यास से काफी मदद मिलती है। स्वास्थ्यवर्धव आसनों का अभ्यास बच्चे भी कर सकते हैं। लेकिन बच्चे 

के लिये योगमुद्रा के भिन्न अन्य मुद्राओं का अभ्यास निषिद्ध हैं। जो लड़कियाँ ऋतुमती होती हैं और ११९ से अधिक की आयु के लड़के (उष्णप्रधान देशों में एवं शीतप्रधान देशों में ९२ वर्ष) मुद्राओं का अभ्यास कर सकते हैं। 

मुद्राओं के अभ्यास से इन्द्रगन्थि और कामग्रन्थियाँ पुष्ट होकर फ्रियाशील होती हैं। प्रन्थियों को कुत्रिम रूप से पुष्ट करने से साधारण स्थास्थ्य एवं मस्तिष्क के सन्तुलन में बाधा: होती है। अतएवं वयस्क न होने तक उन्हें मुद्राओं का 

अभ्यास न करावें। 

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