उड्डीयानबन्ध मुद्रा, उष्टासन, कुक्कुटासन,जानुशिरासन, बत्रिकोणासन, धनुरासन, पद्मासन, मुक्त पद्मासन।

उड्डीयानबन्ध मुद्रा 

विधि-१८ इंच की दूरी रखते हुए अपने पैरों पर खड़े होकर शरीर को सामने इस प्रकार झुकावें कि आपकी दोनों हथेलियाँ दोनों घुटनों से ऊपर जंघाओं पर हें। श्वास छोड़ते हुए अपने पेट के सामनेवाले भाग को संकुचित करें। ताकि वहाँ एक गड्ढा जैसा हो जाये। जब तक आप श्वास रोककर रख सकें पेट को संकुचित रखें।

उड्डीयानबन्ध मुद्रा 

उसके बाद श्वास लेते हुए पूर्व की स्थिति कर लें। यह सावधानी रखें कि उदर की मांसपेशियाँ पीछे की ओर न तनें। इस मुद्रा का अभ्यास बैठकर भी किया जा सकता है। प्रारम्भ में इसका अभ्यास २-३ बार करना चाहिये।

उपयोग

-यह मुद्रा उदर की अम्रिग्रन्थियों को तथा वरुणग्रन्थियों को पुष्ट करती है। ताकि वे कोष्ठबद्धता, अपचन, उदरशूल, पित्तशूल, पित्तअश्मरी आदि रोगों से चच् सकें। स्त्रियों से कष्टरज:, प्रदर आदि रोगों में लाभ करता है। इसके नियमित अभ्यास करनेवाले व्यक्ति हैजा या चेचक के शिकार नहीं होते हैं। इसके अभ्यास से उदर की सभी स्नायु एवं मांसपेशियाँ सुट्ढ़ एवं स्वस्थ बनी रहती हैं। योगशाज् फहता है–/इड्जीयानो झसौ बन्यों मृत्युमातंगकेशरी।/ अभ्यसेत्‌ सतर्त यस्तु वृद्धोएपि तठणायते॥ * अर्थात यह मुद्रा मृत्यु को जीतनेवाली है क्योंकि यह मनुष्य की अकालतृत्यु से रक्षा करती है। इसके नियमित अभ्यास से वृद्ध भी तरुण बना रहता है। यह अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि इसके अभ्यास से यकृत, प्लीहा, अम्न्याशय, बृक्त, वृषण, डिम्ब आदि ग्रन्थियाँ स्वस्थ रहती हैं। 

उष्टासन 

विधि

-घुटने के बल बैठकर शरीर को पीछे की ओर झुकावें। श्वास निकालते हुए सीने को उठावें शरीर को नीचे झुकावें एवं हाथों से पैरों की टखनों के पास से पकड़ लें। इस प्रकार आपका शरीर अर्धवृत्ताकार स्थिति में हो जावेगा और. 

उष्टासन 

आपके हाथों प्ते आपको समर्थन प्राप्त होगा। श्वासरहित अवस्था में १०-१५ सेकेण्ड तक रहें तदुपरान्त पूर्व स्थिति में आ ज्ञायें। कुछ विश्राम के बाद पुनः इस क्रिया को अध्यास करें। इस आसन को २-३ नार दोहरावें। 

कुक्कुटासन 

उपयोग-

-इस आसन के अभ्यास से रीढ़ लचीली बनी रहती है। ताकि संबंधित नसें एवं स्‍नायु सशक्त होकर शरीर की स्फूर्ति को कायम रख सकें। पेल्विकप्रदेश एवं गुदाप्रदेश की नसें भी इससे पुष्ट होने के फलस्वरूप ब्रह्मचर्य पालन में स्तम्भनशक्ति 

बढ़ने में सहयोग प्राप्त होता है।

 कुक्कुटासन 

विधि-

पद्मासन लगाकर बैठिये। अपने दाहिने हाथ को दाहिने घुटने के भीतर की ओर घुसावें। उसी प्रकार बायाँ हाथ भी बायें घुटने के भीतर की ओर घुसावें। इस प्रकार आप अपने हथेलियाँ ज़मीन पर रखकर पूरा पंजा फैलाकर शरीर को ऊपर उठावें। इस प्रकार शरीर की कोहनी तक उठावें एवं उसी अवस्था में १ से ३ मिनट तक रहें। इसके बाद शरीर को ज़मीन पर उतार लें और कुछ सेकेण्ड विश्राम करें। इसी प्रकार इस क्रिया को ३ या ४ बार करें। 

कुक्कुटासन उपयोग

-जिस प्रकार पादागुष्ठासन के अभ्यास से पैरों की नसें एवं मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं, उसी प्रकार कुक्कुटासन के अभ्यास से हाथ की स्तायु एवं मांसपेशियों को गवजीवन मिलता है। वास्तव में हाथ एवं कलाई कोई भी कठिन कार्य करने

 कुक्कुटासन

उपयोग

–इस आसन के अभ्यास से रीढ़ लचीली बनी रहती है। ताकि संबंधित नसें एवं स्‍नायु सशक्त होकर शरीर की स्फूर्ति को कायम रख सकें। पेल्विकप्रदेश एवं गुदाप्रदेश की नसें भी इससे पुष्ट होने के फलस्वरूप ब्रह्मचर्य पालन में स्तम्भनशक्ति बढ़ने में सहयोग प्राप्त होता है। कुक्कुटासन 

विधि

पद्मासन लगाकर बैठिये। अपने दाहिने हाथ को दाहिने घुटने के भीतर की ओर घुसावें। उसी प्रकार बायाँ हाथ भी बायें घुटने के भीतर की ओर घुसावें। इस प्रकार आप अपने हथेलियाँ ज़मीन पर रखकर पूरा पंजा फैलाकर शरीर को ऊपर उठावें। इस प्रकार शरीर की कोहनी तक उठावें एवं उसी अवस्था में १ से ३ मिनट तक रहें। इसके बाद शरीर को ज़मीन पर उतार लें और कुछ सेकेण्ड विश्राम करें। इसी प्रकार इस क्रिया को ३ या ४ बार करें। 

कुक्कुटासन उपयोग

जिस प्रकार पादागुष्ठासन के अभ्यास से पैरों की नसें एवं मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं, उसी प्रकार कुक्कुटासन के अभ्यास से हाथ की स्तायु एवं मांसपेशियों को गवजीवन मिलता है। वास्तव में हाथ एवं कलाई कोई भी कठिन कार्य करने 

जानुशिरासन 

पर नियंत्रण किया जा सकता है, अतएव इसके अभ्यास से ब्रह्मचर्य के पालन में पूरा सहयोग मिलता है। पैरों की वातव्याधि जैसे गठिया, रेंगण, अर्शरोग, मूत्र प्रदाह, अनिद्रा आदि के निवारण में भी इस आसन से मदद मिलती है। 

जानुशिरासन 

विधि-

दोनों पांवों को सामने फैलाकर बैठ जायें। बायें पाँव को इस प्रक्कार मोड़ें कि बायीं एड़ी अण्डकोषों के नीचे लगी रहे। धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए दोनों हाथों से दाहिने पैर के अंगूठे को पकड़े, साथ ही अपने माथे से दाहिने पाँव के घुटने को छूने का प्रयत्न करें। नवीन अभ्यासार्थी प्रारम्भ में पाँव ज़मीन पर सीधा न रख सकेंगे पर यह कठिनाई कुछ ही दिनों के अभ्यास से दूर हो जायेगी। इस अवस्था में श्वास रोककर कुछ सेकेंड तक रहें। इसके बाद धीरे धीरे श्वास ग्रहण करते हुए सीधी स्थिति में आ जायें। इस आसन को सिर्फ ३-४ बार करें। इसके बाद ऊपर बतायी क्रिया के अनुसार दाहिने पैर की एड़ी को अपने अण्डकोष के नीचे रखकर इसको दोहरावें। 

जानुशिरासन उपयोग

–इस आसन से भूख बढ़ती है, नांभिप्रदेश की स्नायु एवं मांसपेशियों सबल होती है, कमज़ोरी एवं सुस्ती दूर होती है और रीढ़ लचीली होती है।

योग से रोग निवारण 

जैसे गठिया, रेंगण एवं अर्श आदि की चिकित्सा में इससे मदद मिलती है। किशोरावस्था में पायी जानेवाली शारीरिक सुस्ती इस आसन से दूर होती है। 

बत्रिकोणासन 

विधि--अपनी सुविधा के अनुसार पाँवों को डेढ़ या दो फिट दूर रखकर खड़े हो जायें। शरीर के ऊपर के आधे हिस्से को नीचे झुका लें ताकि आप अपने नायें हाथ से बायें पैर का अँगूठा पकड़ सकें। यह क्रिया करते समय दोनों घुले 

धनुरासन 

इस स्थिति में १-२ सेकेंड रहें। बाद में खड़े हो जावें। यही क्रिया दाहिने हाथ मे दाहिने पाँव का अंगूठा पकड़कर, बायाँ हाथ ऊपर की ओर ले जाकर दोहावें। अब इसका आप सुगमतापूर्वक अभ्यास करने लगें तो शीघ्र शीघ्र १० से २० बार तक इस क्रिया को दोहरावें। 

उपयोग

-इस आसन के अभ्यास से रीढ़ की लचक स्थायी बनी रहती है और अभ्यास के समय अधिक रक्तसंचार होने के फलस्वरूप वहाँ की स्नायु एवं मांसपेशियों को पोषण प्राप्त होता है। जो व्यक्ति मत्स्येद्रासन का अभ्यास न कर सके उन्हें उसके स्थान पर त्रिकोणासन का अभ्यास करना चाहिये। उन्हें आंशिक लाभ होगा। त्रिकोणासन के अभ्यास से अपचन, कोष्ठबद्धता दूर होकर भूख बढ़ती है। जिन बच्चों का एक पाँव दूसरे से छोटा है, इस कमी को दूर करने में यह आसन काफी सहायता करता है। 

धनुरासन 

विधि

-शलभासन की तरह पेट के बल लेट जावें। घुटने के पास से पैरों को मोड़कर अपने कमर से ऊपर के हिस्से को इस प्रकार ऊपर उठावें कि आप दाहिने हाथ से दाहिने पैर के टखने (21112) के पास से एवं बायें हाथ से बायें पैर के टखने के पास से भली प्रकार पकड़ सकें। इस प्रकार की स्थिति में सिर को पीठ की तरफ अधिक से अधिक मोड़ें एवं घुटनों को भरसक ऊपर उठावें। शरीर का पूरा भार पेट पर होगा। इस प्रकार ५-७ सेकेण्ड रहें। हाथ को छोड़ दें। पूर्व स्थिति में जाकर कुछ समय विश्राम करें। पुन: इस आसन को करें। इस प्रकार ३-४ बार से अधिक न करें। 

अभ्यास में पूर्ण सफलता प्राप्त कर धनुरासन की अवस्था में ही घुटने को मिलाने का प्रयल करें। 

उपयोग-

-भुजंगासन, शलभासन तथा धनुरासन आपस में मिलकर एक पुर्णांग आसन होता हैं। रीढ़ को अगर ३ भागों में विभक्त किया जाये तो भुजंगासन के अभ्यास से ऊपरी भाग, शलभासन से निचला भाग तथा धनुरासन के अभ्यास से रीढ़ के मध्य भाग का लचीलापन स्थायी होता है। साथ ही साथ इन भागों की स्नायु एवं मांसपेशियाँ सबल होती हैं। धनुरासन में चूंकि उदर भाग पर शरीर का पूरा भार पड़ता है वृहद्‌ एवं लघु अंत्र, यकृत एवं प्लीहा के दोष इसके अभ्यास से दूर होते हैं। साथ ही साथ पेट की सभी मांसपेशियाँ निर्दोष होती है। यह आसन की जड़ को नष्ट करता है एवं पेट के भाग पर चर्बी एकत्र नहीं होने।

 पद्मासन 

विधि

पद्मासन दो प्रकार का होता है (१) मुक्त-पद्मासन, (२) बद्ध-पद्मासन। दाहिने पैर को बायीं जाँघ पर रखें एवं बायीं पैर को दाहिने जाँघ पर रखें। अपनी जिहा सामने के दाँतों की जड़ में लगाये रखें। अपने नासिकाग्र भाग को देखते हैं। रीढ़ हमेशा सीधी रखें। बायीं एवं दाहिनी हथेलियाँ क्रमश: बायें एवं दाहिने घुटने पर रखें। यही मुक्त पद्मासन कहलाता है। 

बद्ध पद्मासन के लिये मुक्त पद्मासन की स्थिति में बैठकर दाहिने हाथ को पीठ के पीछे से घुमाकर बायीं जाँघ पर स्थित दाहिने पैर का अंगूठा पकड़ें। उसी प्रकार बायें हाथ को भी पीछे से घुमाकर उससे बायें पैर का अंगूठा पकड़ें जो दाहिनी जाँघ पर है। अपनी ठुड्डी को गले पर लगाये रहें। नासिकाग्र भाग को देखते रहें। यही बद्ध पद्मासन की क्रिया है। 

मुक्त पद्मासन 

उपयोग–

यह शारीरिक स्वास्थ्य स्थायी रखने के लिये, गठिया वात तथा पैर का दोष मिटाने के लिये अत्यन्त उपयोगी है। प्राणायाम आदि बहुत-सी इस प्रकार की मुद्रायें हैं जिनका अभ्यास पद्मासन में बैठकर किया जाता है। इसके अतिरिक्त सिद्धि प्रात करने के लिये या ध्यानस्थ होने के लिये भी यह आवश्यक है। रीढ़ का टेढ़ा होना स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक उन्नति में बाधक है। बद्ध पद्मासन से यह दोष ठीक हो सकता है। यही कारण है कि योग में इस दोष के निवारण एवं रैढ़ को सबल बनाने के लिये इतने आसन आदि क्रियाएँ बतायी गयी हैं। 

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