योगविद्या का विजय-अभियान।

योगविद्या का विजय-अभियान 

जैसे सूर्य स्वाभावत: पूर्व में उदय होता है उसी तरह उच्चतम ज्ञान का सूर्य, श्रेष्ठटम ज्ञान पूर्व में अर्थात्‌ हमलोगों के भारत में, संसार के पूर्व क्षितिज में उदित हुआ है। यह ज्ञान की किरण पूर्व से पश्चिम, एशिया से यूरोप, यूरोप से अमेरिका और फिर अमेरिका से अफ्रीका की ओर बढ़ती जायेगी। 

पूर्व और पश्चिम का यह सांस्कृतिक संबंध बहुत पुराना है। जब हमलोग ग्रीक दर्शन को पढ़ते हैं तो यह मालूम पड़ता है कि यह भारतीय दर्शन की ही अस्पष्ट विवृति है। उस समय की संस्कृति और शिक्षा में उन्नत पर्शिया बहुत शताब्दियों तक पूर्व और पश्चिम के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केन्द्र था। प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के जीवन चरित्र में हम पाते हैं कि उन्होंने १० वर्षों तक शिक्षा के लिए पूर्व में बिताया। उन्होंने शायद पर्शियन विश्वविद्यालय में भारतीय सांख्यदर्शन और पातंजल योगदर्शन पढ़ा था। प्लेटो का जीवन और उनकी शिक्षा भारतीय दार्शनिकों की तरह है। प्लेटो महात्मा बुद्ध के समकालीन थे। सांख्य और पातंजल योगदर्शन को गौतम बुद्ध के आविर्भाव से बहुत पहले ही एशिया और अफ्रीका के विभिन्न राज्यों की विद्वत्मण्डली (विश्व विद्यालयों) में प्रशंसा प्राप्त हो चुकी थी। 

बहुत से इतिहासकारों की राय है कि पर्शिया के अग्रिपूजक वैदिक जाति के अप्रिपूजकों की ही एक शाखा है। पुराने इतिहासों में इस बात के प्रमाण हैं कि भारत के विद्वान पर्शिया में शिक्षकों के रूप में जाया करते थे, वे पर्शिया के सरकारी अधिकारियों द्वारा काफी इज्जत के साथ निमन्त्रित किये जाते थे। आगे चलकर, तीसरी और चौथी शताब्दी ए.डी. में वैदिक आदर्श, योग पद्धति और बुद्ध के सिद्धान्त अहिंसा को लेकर बुद्ध के अनुयायी सन्यासियों द्वारा अरब, पर्शिया, सीरिया, मिश्र, वैलेस्टाइइन और अलेक्जेण्ड्रिया तक फैल गए। वास्तव में, इन राज्यों ने भारत के बौद्धर्म और योग के सिद्धान्तों का स्वागत किया था। सीरिया के तीसरी शताब्दी के इतिहास में हम प्लेटिनल नामक एक वहीं के योगी का वर्णन पाते हैं जिसने अपने जीवन में चार बार समाधि प्राप्त की थी। 

बौद्ध सन्यासियों द्वारा वेद के आदर्शवाद विश्वप्रेम और अहिंसा तथा योगविद्या का प्रचार और प्रसार प्रायः आधी पृथ्वी पर हो चुका था। यह सशमत्न सेना द्वारा पाशविक खुर्रेजी का अभियान नहीं था, बल्कि यह वैदिक ईश्वरीय ज्ञान, मनुष्यमात्र के लिए विश्वप्रेम, समस्त सृष्टि के जीवमात्र से प्रेम और योग के प्रसार का अभियान था। 

बौद्धमत के ऊँचे ज्ञान और ऊँचे दर्शन को समझ सकना उस देश के जन साधारण के लिए आसान नहीं था परन्तु बौद्धमत के साम्यवाद और नैतिक आदर्श क्या योगाभ्यास ने जनसाधारण का ध्यान आकर्षित किया। इसी कारण बिना राजकीय प्रहायता लिए ही बौद्धमत आधे भूमंडल में फैल गया। बौद्धमत के आदर्श कुछ 

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योगविद्या का बिजय अभियान 

भी नवीन नहीं थे, वह वैदिक ज्ञान की विभिन्न शाखा-प्रशाखाओं में से एक है। औौद्धदर्शन ने वेद के निर्गुण तत्व अर्थात्‌ शून्यतत्व को प्रधानता दी है। 

करीब एक सौ वर्ष पहले भारत के पूर्वी अंचल में ब्राह्मर्म का उदय हुआ। ज्यों ही ब्राह्मधर्म की उपयोगिता का शेष हुआ यह फिर धीरे धीरे हिन्दूधर्म में समाहित हो गया। ऐसे ही कारणों से बौद्ध मत भी हिन्दूधर्म से उदित हुआ और अपनी उपयोगिता के बाद स्वभावत: इसमें समाहित हो गया। बौद्ध आदर्शों के दब जाने पर एशिया में इसाई धर्म अस्तित्व में आया। 

१८ वर्ष से २९ वर्षों तक के १२ वर्ष इसामसीह के जीवन के बारे में न तो बाइबिल में और न ही उनके देशवासियों द्वारा लिखे गये किसी जीवन चरित्र में ही है। यीशू ने १२ वर्ष भारत में बिताये। वे भारत में दूर-दूर तक घूमे तथा भारतीय मठों में भारतीय संन्यासियों के साथ योग और धर्माचरणों का अभ्यास किया। काश्मीर सीमा के निकट हिमिश मठ नामक एक पुराने मठ के पुस्तकालय में इसका विवरण प्राप्त हुआ है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले हमारे देश के दैनिक समाचार पत्र स्टेट्समैन तथा लनन्‍्दन की दैनिक पत्रिकाओं में इस पुस्तक के विवरण छपे थे। 

ईसा द्वारा लिखित कृतियाँ और वे आदर्श जिसकी वे शिक्षा देते थे, हिन्दू तथा बौद्धों की नैतिक शिक्षा के समान है। क्राइस्ट, आदर्श और विचार में बुद्ध के अनुज थे। इसलिये हमलोग यीशू को एक भारतीय संन्यासी जिसने भारतीय आदर्श से प्रेरणा प्राप्त की है, ऐसा मानते हैं। वह वैदिक आदर्श और भाव के जीवन्त प्रतीक थे। 

ईसामसीह के मरकर फिर जीवित होने, कब्र से फिर निकल आने और उनके जीवित होने का विवरण उस मठ से प्राप्त हुई पुस्तक में हैं। भारतीय योगाचार्यगण एक मृत व्यक्ति को जीवित कर देते थें। यह बात नहीं कि वे सभी मेरे मनुष्यों को जीवन प्रदान कर सकते थें बल्कि सिर्फ उन्हीं को जो फाँसी में लटकाकर या किसी दूसरी आकस्मिक घटनाओं द्वारा मृत्यु को प्राप्त हुए हैं क्योंकि उनके यंत्र शेग द्वारा विधटित नहीं हुए रहते हैं। परन्तु जिनके शारीरिक यंत्रों में गड़बड़ी हो गई है, उन्हें पुनजीवित नहीं किया जा सकता। यीशू ने अपने सीधे और मीठे स्वभाव के कारण अपने गुरु और सह-सन्यासियों के प्रेम को आकर्षित कर लिया था। यह सुनकर कि यीशू को शूली पड़ेगी, उनके पूज्य गुरुदेव, जो एक बड़े योगी थे और नहीं ठहर सकें। वे कब्र के मैदान में गये थें, उसे उठाकर सूक्ष्म शरीर या आत्मा को आकर्षित कर यीशू को फिर जीवित किया और उसे लेकर भारत आयें। उसके बाद यीशू सिर्फ ३ (तीन) वर्ष जीवित रहें क्योंकि शूली के घावों के कारण वे अपने स्वाभाविक स्वास्थ्य को फिर से कभी प्राप्त नहीं कर सकें। वह स्थान जहाँ यीशू का शरीर जलाया गया वहाँ आज भी एक मेला लगता है जो ईशाक मेला (ईशा का मेला) कहलाता है। भारतवर्ष में यीशू ईशा के नाम से पुकारे जाते 

 योग से रोग निवारण 

हैं। यीशू को भारतीय योगाचार्यों से संबंध था, इसी कारण हमने वहाँ पर उनके पुनर्जीवित होने के रहस्य का संक्षिप्त वर्णन किया है। 

ईसाई मत के बाद “मुहम्मद” के संस्थापकत्व में इस्लाम धर्म का अस्तित्व हुआ; जिस धर्म ने बन्दक की नोक के बल पर आधे एशिया और यूरोप पर अपनी विजय-पताका फहराई। उन दिनों वहाँ बौद्ध धर्म फैला हुआ था। यहाँ तक कि मुहम्मद साहन की जन्मभूमि तक फैल गया था। उन शहरों में बुद्ध और बुद्धतंत्र की देवी-देवताओं की प्रतिमा की जनता द्वारा उपासना की जाती थी। इस्लाम की जेहाद की बाढ़ में अरब से बौद्धधर्म, पर्शिया से पारसी धर्म, मिम्न से मिम्री धर्म बह गये। नये पैदा हुए इस्लाम धर्म ने मूर्तिपूजा को बुतपरस्ती कहा। यह पहले ही कहा जा चुका है कि मूर्ति पूजा अरब और उसके समीपस्थ स्थानों में बौद्ध संन्यासियों द्वारा फैलाइ गयी थी। भारतीय देवी-देवता, तत्वमुक्ति, भारतीय दर्शनशार््र की भावधारा के प्रतीक हैं। जो आज तक इस चतुर्दिक प्रसारित भारत की मूर्तिपूजा के रहस्य को जानते हैं वे इसे बुतपरस्ती नहीं कह सकते और वे इस मूर्तिपूजा को प्रशंसा की दृष्टि से देखेंगे। 

भारत ने ६ सौ वर्षों तक इस्लाम के इस भयंकर अभियान को रोका। तदनन्तर भारत में भी इस्लाम की राजनैतिक प्रभुता स्थापित हुई। 

यदि सिर्फ एक जाति उन्नत हो जाती है तो समस्त मानवजाति लाभान्वित नहीं होती है। समस्त मानवजाति में उच्च शिक्षा और उच्च संस्कृति का प्रवेश आवश्यक है। शायद क्रमिक विकासवाद के नियम तथा क्रमिक उन्नति के अनुसार भारत में इस्लाम का प्रसार वैदिक विचारधारा और आदर्श के प्रसार के लिए आवश्यक था। इस्लाम के अनुयायियों ने भारतीय ज्योतिष, गणित, उपनिषद्‌, योगशास्त्रादि तथा धार्मिक पुस्तकों का अरबी और पर्शियन (फारसी) भाषाओं में अनुवाद किया। इस्लाम धर्म के जरिये पुस्तकें यूगोप, अफ्रीका और एशिया के विभिन्न देशों में प्रचारित हुई। इस्लामी सभ्यता वैदिक सभ्यता के सम्पर्क में आकर कुछ ऊपर उठ गई। जिसके फलस्वरूप एक उदारचेता, धर्मसहिष्णु सम्राट अकबर का जन्म भारतीय मुसलिम समाज में हुआ। उपनिषद्‌ जो वेद के खण्ड हैं-ज्ञानमार्ग, योगमार्ग, तंत्रमा्ग और अन्य मार्गों के प्लोत हैं। अकबर के समय में इस्लाम धर्म को वैदिक धर्म के साथ एकताबद्ध करने के लिये ‘अल्लाहोपनिषद की रचना हुई। दूसरी ओर इस समय सूफी धर्म की श्रेष्ठता प्रतिष्ठित हुई। 

तीसरी शताब्दी में सृफी धर्म की स्थापना सीरिया और फिलस्तीन में हुई। यह भारतीय वेदान्त और योगशाम्र का आधार बना। इस्लाम के भयंकर आक्रमण से सूफी धर्म का उन्मूलन नहीं हुआ। इस्लाम के साथ मिलकर सूफी धर्म जीवित रह गया। सूफी धर्म की बातें, भारतीय ज्ञान धर्म या वेदान्त के समान हैं। वेदान्त कहता है :-“अहं ब्रह्मास्मि’, ‘अयमात्मा ब्रह्म॑-मैं ब्रह्म हूँ, मुझमें जो आत्मा है वह ब्रह्म है, मैं शरीर नहीं हैँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं बुद्धि या अहंकार नहीं हूँ। 

योगविद्या का विजय अभियान ३३७ 

तुम्हें अपने मन और शरीर की दासता से स्वयं को मुक्त करना होगा। मेरे शरीर और मन के परे जो चेतनावस्था है वही मेरा वास्तविक स्वरूप है। ‘वह मैं हूँ और “मैं वह हूँ। सूफी धर्म का कहना भी ठीक यही है। ‘अनल हक’-मैं ही सत्य स्वरूप हूँ, मेरे अन्दर जो आत्मा है वही ईश्वर है। उस समय का मुस्लिम प्रमाज सुफी धर्म के इस उन्नत ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सका, इसलिए यीशू की तरह सूफी धर्म के संस्थापकाण को भी अपना जीवन अपने धर्म की प्रतिष्ठा के लिए बलिदान करना पड़ा। इस नये धर्म में विश्वास रखने के कारण ही सूफी प्षाधक मंसूर धर्मान्ध मुसलमानों के हाथ का सर्वप्रथम शिकार हुए जो उन लोगों द्वारा जीवित खाल खींचकर मार डाले गए। सिर्फ वही अकेले नहीं, बहुत से और सूफी साधकों को ऐसी-ऐसी क्रूर यातनाएँ सहनी पड़ी। कुछ को अम्रि के घेरे में जीवित जला दिया गया। 

इन अमानुषिक अत्याचारों के होते हुए भी उन्होंने दुःख प्रकाश नहीं किया, उन्होंने आहें नहीं निकालीं। मृत्युभय ने उन्हें कभी विचलित नहीं किया। अपने जीवन की बलि देकर इन शहीदों ने सूफी मत को प्रतिष्ठित किया है। हमने पहले ही कहा है कि सूफी मत में वेद और वेदान्त की प्रधानता है। अब सूफी इस्लाम धर्म का एक अंग है जो इस्लाम धर्म के लिए गर्व और प्रतिष्ठा की वस्तु है। इस्लाम भक्ति पंथ हैं। सूफी साधकों ने इस्लाम में ज्ञान और योग को घुसाकर प्रकाशित और पूरित किया है। बुद्धिमान और विद्वान मुसलमानों ने सूफी मत के गहन सत्य का अनुभव कर इसी को कुरान में युक्त किया। आजकल भतक्तिधर्म और ज्ञानधर्म वर्तमान कुरान में सम्मिलित और प्रेमपूर्वक रक्षित हैं। मूल कुरान की साधनों को “शरियत” कहा जाता है। नियमित नमाज और प्रार्थना दिन में ५ बार शरियत के अंग हैं। कुरान में जो ज्ञानधर्म युक्त किया गया है सुफी साधकों के प्रभाव के कारण उसे हकीकत कहा जाता है। हकीकत का अर्थ अन्तःसाधना। योग और ज्ञान की सहायता सर्वश्रेष्ठ सत्य का अनुभव करने के लिए अन्तर्मुखी साधना है। 

सूफियों ने योग के प्रायः समस्त प्रकार की यौगिक साधनायें कुण्डलिनी योग से ध्यान और उपयोग तक सीख लिए हैं। योगशात्र कहता है; ‘तजपस्तदर्थभावनम्‌–उसका नाम लो और उसके सत्यस्वरूप का ध्यान करो। प्रणब के सहारे हर श्वास में जप का अभ्यास और सोहें मंत्र योग साधना का एक अंग है। यह जप साधना सूफियों द्वारा हकीकत में शामिल किया गया है। वे ‘ला-इल्लाह उच्चारण के समय श्वास भीतर ले जाते और ‘इललहल्लाहँ कहने के समय इसे बाहर निकालते हैं। ‘हाल’, ‘फना’, ‘मोकाम’ इत्यादि शब्दों का भी इस्तेमाल करते हैं। यौगिक अनुभव प्राप्ति के भिन्न-भिन्न दशाओं को प्रतिपादित करने के लिए भारतवर्ष में सिद्धिप्राप् सूफी संत सलीम चिश्ती अकबर के दरबार में बहुत प्रभावशाली हो गये। निःसन्तान सम्राट को इस सन्त के आशीर्वाद से एक पुत्र की प्राप्ति हुईं। इसी कारण उस लड़के का नाम सलीम रखा। यहाँ पूर्व बंगाल में एक दूसरे महान Sant.

इ्रे८ योग से रोग निवारण 

हैं। यीशू को भारतीय योगाचार्यों से संबंध था, इसी कारण हमने वहाँ पर उनके पुनर्जीवित होने के रहस्य का संक्षिप्त वर्णन किया है। 

ईसाई मत के बाद “मुहम्मद” के संस्थापकत्व में इस्लाम धर्म का अस्तित्व हुआ; जिस धर्म ने बन्दक की नोक के बल पर आधे एशिया और यूरोप पर अपनी विजय-पताका फहराई। उन दिनों वहाँ बौद्ध धर्म फैला हुआ था। यहाँ तक कि मुहम्मद साहन की जन्मभूमि तक फैल गया था। उन शहरों में बुद्ध और बुद्धतंत्र की देवी-देवताओं की प्रतिमा की जनता द्वारा उपासना की जाती थी। इस्लाम की जेहाद की बाढ़ में अरब से बौद्धधर्म, पर्शिया से पारसी धर्म, मिम्न से मिम्री धर्म बह गये। नये पैदा हुए इस्लाम धर्म ने मूर्तिपूजा को बुतपरस्ती कहा। यह पहले ही कहा जा चुका है कि मूर्ति पूजा अरब और उसके समीपस्थ स्थानों में बौद्ध संन्यासियों द्वारा फैलाइ गयी थी। भारतीय देवी-देवता, तत्वमुक्ति, भारतीय दर्शनशार््र की भावधारा के प्रतीक हैं। जो आज तक इस चतुर्दिक प्रसारित भारत की मूर्तिपूजा के रहस्य को जानते हैं वे इसे बुतपरस्ती नहीं कह सकते और वे इस मूर्तिपूजा को प्रशंसा की दृष्टि से देखेंगे। 

भारत ने ६ सौ वर्षों तक इस्लाम के इस भयंकर अभियान को रोका। तदनन्तर भारत में भी इस्लाम की राजनैतिक प्रभुता स्थापित हुई। 

यदि सिर्फ एक जाति उन्नत हो जाती है तो समस्त मानवजाति लाभान्वित नहीं होती है। समस्त मानवजाति में उच्च शिक्षा और उच्च संस्कृति का प्रवेश आवश्यक है। शायद क्रमिक विकासवाद के नियम तथा क्रमिक उन्नति के अनुसार भारत में इस्लाम का प्रसार वैदिक विचारधारा और आदर्श के प्रसार के लिए आवश्यक था। इस्लाम के अनुयायियों ने भारतीय ज्योतिष, गणित, उपनिषद्‌, योगशास्त्रादि तथा धार्मिक पुस्तकों का अरबी और पर्शियन (फारसी) भाषाओं में अनुवाद किया। इस्लाम धर्म के जरिये पुस्तकें यूगोप, अफ्रीका और एशिया के विभिन्न देशों में प्रचारित हुई। इस्लामी सभ्यता वैदिक सभ्यता के सम्पर्क में आकर कुछ ऊपर उठ गई। जिसके फलस्वरूप एक उदारचेता, धर्मसहिष्णु सम्राट अकबर का जन्म भारतीय मुसलिम समाज में हुआ। उपनिषद्‌ जो वेद के खण्ड हैं-ज्ञानमार्ग, योगमार्ग, तंत्रमा्ग और अन्य मार्गों के प्लोत हैं। अकबर के समय में इस्लाम धर्म को वैदिक धर्म के साथ एकताबद्ध करने के लिये ‘अल्लाहोपनिषद की रचना हुई। दूसरी ओर इस समय सूफी धर्म की श्रेष्ठता प्रतिष्ठित हुई। 

तीसरी शताब्दी में सृफी धर्म की स्थापना सीरिया और फिलस्तीन में हुई। यह भारतीय वेदान्त और योगशाम्र का आधार बना। इस्लाम के भयंकर आक्रमण से सूफी धर्म का उन्मूलन नहीं हुआ। इस्लाम के साथ मिलकर सूफी धर्म जीवित रह गया। सूफी धर्म की बातें, भारतीय ज्ञान धर्म या वेदान्त के समान हैं। वेदान्त कहता है :-“अहं ब्रह्मास्मि’, ‘अयमात्मा ब्रह्म॑-मैं ब्रह्म हूँ, मुझमें जो आत्मा है वह ब्रह्म है, मैं शरीर नहीं हैँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं बुद्धि या अहंकार नहीं हूँ। 

योगविद्या का विजय अभियान ३३७ 

तुम्हें अपने मन और शरीर की दासता से स्वयं को मुक्त करना होगा। मेरे शरीर और मन के परे जो चेतनावस्था है वही मेरा वास्तविक स्वरूप है। ‘वह मैं हूँ और “मैं वह हूँ। सूफी धर्म का कहना भी ठीक यही है। ‘अनल हक’-मैं ही सत्य स्वरूप हूँ, मेरे अन्दर जो आत्मा है वही ईश्वर है। उस समय का मुस्लिम प्रमाज सुफी धर्म के इस उन्नत ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सका, इसलिए यीशू की तरह सूफी धर्म के संस्थापकाण को भी अपना जीवन अपने धर्म की प्रतिष्ठा के लिए बलिदान करना पड़ा। इस नये धर्म में विश्वास रखने के कारण ही सूफी प्षाधक मंसूर धर्मान्ध मुसलमानों के हाथ का सर्वप्रथम शिकार हुए जो उन लोगों द्वारा जीवित खाल खींचकर मार डाले गए। सिर्फ वही अकेले नहीं, बहुत से और सूफी साधकों को ऐसी-ऐसी क्रूर यातनाएँ सहनी पड़ी। कुछ को अम्रि के घेरे में जीवित जला दिया गया। 

इन अमानुषिक अत्याचारों के होते हुए भी उन्होंने दुःख प्रकाश नहीं किया, उन्होंने आहें नहीं निकालीं। मृत्युभय ने उन्हें कभी विचलित नहीं किया। अपने जीवन की बलि देकर इन शहीदों ने सूफी मत को प्रतिष्ठित किया है। हमने पहले ही कहा है कि सूफी मत में वेद और वेदान्त की प्रधानता है। अब सूफी इस्लाम धर्म का एक अंग है जो इस्लाम धर्म के लिए गर्व और प्रतिष्ठा की वस्तु है। इस्लाम भक्ति पंथ हैं। सूफी साधकों ने इस्लाम में ज्ञान और योग को घुसाकर प्रकाशित और पूरित किया है। बुद्धिमान और विद्वान मुसलमानों ने सूफी मत के गहन सत्य का अनुभव कर इसी को कुरान में युक्त किया। आजकल भतक्तिधर्म और ज्ञानधर्म वर्तमान कुरान में सम्मिलित और प्रेमपूर्वक रक्षित हैं। मूल कुरान की साधनों को “शरियत” कहा जाता है। नियमित नमाज और प्रार्थना दिन में ५ बार शरियत के अंग हैं। कुरान में जो ज्ञानधर्म युक्त किया गया है सुफी साधकों के प्रभाव के कारण उसे हकीकत कहा जाता है। हकीकत का अर्थ अन्तःसाधना। योग और ज्ञान की सहायता सर्वश्रेष्ठ सत्य का अनुभव करने के लिए अन्तर्मुखी साधना है। 

सूफियों ने योग के प्रायः समस्त प्रकार की यौगिक साधनायें कुण्डलिनी योग से ध्यान और उपयोग तक सीख लिए हैं। योगशात्र कहता है; ‘तजपस्तदर्थभावनम्‌–उसका नाम लो और उसके सत्यस्वरूप का ध्यान करो। प्रणब के सहारे हर श्वास में जप का अभ्यास और सोहें मंत्र योग साधना का एक अंग है। यह जप साधना सूफियों द्वारा हकीकत में शामिल किया गया है। वे ‘ला-इल्लाह उच्चारण के समय श्वास भीतर ले जाते और ‘इललहल्लाहँ कहने के समय इसे बाहर निकालते हैं। ‘हाल’, ‘फना’, ‘मोकाम’ इत्यादि शब्दों का भी इस्तेमाल करते हैं। यौगिक अनुभव प्राप्ति के भिन्न-भिन्न दशाओं को प्रतिपादित करने के लिए भारतवर्ष में सिद्धिप्राप् सूफी संत सलीम चिश्ती अकबर के दरबार में बहुत प्रभावशाली हो गये। निःसन्तान सम्राट को इस सन्त के आशीर्वाद से एक पुत्र की प्राप्ति हुईं। इसी कारण उस लड़के का नाम सलीम रखा। यहाँ पूर्व बंगाल में एक दूसरे महान Sant.

रहते थे। उनका नाम जालान शाह था। वह भी बंगाल के नवार्बों के दरबार में प्रभावशाली थे। हिन्दू और मुसलमान दीनों उनकी प्रतिष्ठा करते थे। हमारे देश में भजन नाम का एक धार्मिक अभ्यास था जिसका अर्थ था एकत्र मिलकर बैठे-बैठे भगवान का नाम स्मरण करना। परन्तु नृत्य करते हुए कीर्तन का अभ्यास उस समय नहीं था। संभवत: पर्शिया के सूफी इसे भारत में लाये। यह पूर्व भारत में गौरांग महाप्रभु और उनके शिष्यों द्वारा बहुत जनप्रिय हुआ। 

इस तरह भारतीय वंशानुक्रमिक ज्ञान और योग के द्वारा इस्लाम धर्म उन्नत और सम्पन्न हुआ। औरंगजेब के भीषण संकीर्ण धर्मान्धता मे अकबर के दोनों धर्मों के सहमिलन के सत्प्रयास पर पानी फेर दिया और मुगल साम्राज्य के पतन में शीघ्रता ला दी। 

अनिवार्य फलस्वरूप विद्या और कला में उन्नति प्राप्त यूरोप के प्रतिनिधियों (अंगरेजों) का आगमन इस्लाम द्वाइ प्रारंभ किये हुए कार्य को पूरा करने के लिये नए राज्य की स्थापना द्वारा हुआ। उन्होंने वैदिक साहित्यों और उसके विचारों को समस्त मानव जाति के बीच अपने पूरे सामर्थ्य से फैलाया। उन्होंने अंग्रेजी में वेदों (यह कहना व्यर्थ है कि उनके द्वारा किया गया वेदों का अर्थ लड़कपन है), उपनिषर्दों तंत्रों, गीता, सांख्य, वेदांत, पातंजल और योग इत्यादि का अंग्रेजी में अनुवाद किया–वास्तव में हिन्दू शास्त्रों द्वारा समस्त संसार में ज्ञान पिपासा की तृप्ति की। पश्चिम में असंख्य योगप्रेमी हैं। उनमें कुछ लोगों ने इसके अभ्यास से ऊँची स्थिति प्राप्त कर योग पर पुस्तकें लिखी हैं। कलकत्ता के भूतपूर्व चीफ जस्टिस मि. वुडरफ उनमें एक प्रर्यात लेखक हैं। उनके द्वारा योग और तंत्र पर लिखी गई पुस्तकों की सारे संसार में सब जगह प्रशंसा हुई है। उन्होंने स्वयं लगन के साथ योगाभ्यास किया था। इसी तरह पूर्वीय ज्ञान की किरणें पश्चिम पर अपना प्रकाश फैला रही हैं। भारत का दर्शन और साहित्य, पश्चिमीय दर्शन को और साहित्य को नया रूप प्रदान कर रहा है। पूर्व और पश्चिम के संगम के फलस्वरूप एक नवीन सभ्यता का उदय हो रहा है। पश्चिम की वैज्ञानिक उन्नति ने ऐसे संगम को आसान बना दिया है। देश और काल का व्यवधान दूर हो गया। हवाई सेवा को धन्यवाद है जिससे एशिया के लिए यूरोप और अमेरिका आज कोई दुरस्थ नहीं, पड़ोसी हैं। जब निःक्षेपणाम्र जो कि राकेटों को चन्द्रमा पर भेज रहा है या पृथ्वी की परिक्रमा करने भेज रहा है, हवाई जहाजों में व्यवहतत हो रहा है, तो यूगपोप और अमेरिका की एशिया से चन्द मिनटों का उड़ान होगी। 

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