भक्ति में शक्ति। मीरा: भगवान की भक्ति और प्रेम की बड़ी महिमा है। जानिए।

भक्ति में शक्ति। मीरा: भगवान की भक्ति और प्रेम की बड़ी महिमा है।

भक्ति में शक्ति। मीरा: भगवान से प्रेम और भक्ति।
भक्ति में शक्ति।


भगवान की भक्ति की बड़ी महिमा है। भक्ति का अन्तिम फल प्रेम है। मीरा ने प्रभु से प्रेम किया। उसका निष्काम प्रेम देखकर सारा संसार उसके हृदय से भाग खड़ा हुआ। अब उसने अपने खाली हृदय में अपने ठाकुर को सजाकर रख लिया। उसका तन महल में अवश्य रहता था किन्तु मन को उसने कृष्ण चरणों में रख दिया था। मीरा ने कहा-


“मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई”


मीरा को सार-सार समझ में आ गया। बस फिर क्या था उसने एक प्रभु का सहारा ले लिया।
वास्तव में मेरा और मेरे का अर्थ, संसार के प्रति लगाने
से कभी भी कल्याण नहीं हो सकता।मैं, मेरा और मेरे कासही एवं सार रूप अर्थ है आत्मा अर्थात् परमात्मा।

विश्वास की जीत : पड़िए


“मीरा ने कहा-

-मेंरी आत्मा का गिरधर है परमात्मा-
मेरे केवल परमात्मा (गिरधर) हैं और दूसरा कोई नहीं। दूसरा माने संसार। मुझे संसार से कोई मतलब नहीं। मैं केवलपरमात्मा की हूं और परमात्मा मेरा है।”


“संसार कहता है कि मेरी ओर मत देखो क्योंकि मैं
नश्वर हूँ। मैं आपकी माँग पूरी नहीं कर सकता। मैं
प्रभु केआधीन हूँ। मैं अपनी प्रसन्नता के लिए ईश्वर से अपेक्षा रखताहूं। अतएव आप भी शान्ति हेतु उनसे ही प्रार्थना करें।”
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।

प्रेम तें प्रकट होहिं मैं जाना।

परमात्मा सर्वत्र है।

परमात्मा सर्वत्र है। जैसे मछली के लिए जल सर्वत्र है।
मछली का जल में ही निवास है और उसका जीवन भी पानी
ही है। मछली अगर पूछे कि पानी कहां है तो हमें बड़ा आश्चर्य
होगा। एक व्यक्ति ने किसी गुरु से पूछा कि भगवान कहां हैं उसने कहा, यह जो तुम बोल रहे हो यह उसी की आवाज है।

पंचभूत का पुतला कैसे जन्म लेता है-कैसे बड़ा होताहै कैसे चलता-फिरता है क्या ये सब ईश्वर का चमत्कार नहीं क्या इन सब कार्यों में प्रभु का अनुभव नहीं हो रहा बस वो ही एक से अनेक होकर सब में रमा हुआ है। शुद्ध-प्रेम के द्वारा वह भली-भांति समझ में आता है।
रामहि केवल प्रेम पिआरा
जानि लेउ जो जान निहारा।
भगवान प्रेम से मिलते हैं। प्रेम हो गया तो भगवान
उसके पीछे-पीछे फिरते हैं क्योंकि भगवान प्रेम के आधीन हैं। संसार का प्रेम दौड़ा-दौड़ाकर मारता है और प्रभु का प्रेम विश्राम देकर तारता है।कौन चाहता है कि मेरे घर में चोरी होवे किन्तु लोग
अज्ञान के कारण अपना ही घर लुटवाते रहते हैं। धर्म परचलने का अर्थ है चोरी से बचना और अधर्म पर चलने काअर्थ है अपनी चोरी करवाना।


जबहिं नाम हिरदे धरयो भयो पाप को नाश।
जैसे चिनगी अग्नि की परी पुराने घास।
मन के निर्मल होने पर प्रभु का नाम और रूप हृदय में
बस जाता है! प्रभु का ज्ञान-प्रभु का प्रकाश-प्रभु की
दया और प्रभु की कृपा होने से पाप रूपी चोर भाग जाता है।


जैसे कितनी भी पुरानी घास हो बस एक बार अग्नि की
चिंगारी-मात्र से जलकर भस्म हो जाती है वैसे ही प्रभु के नामकी शक्ति से सारे पाप जलकर नष्ट हो जाते हैं।


राम भगति मनि उर बस जाकें । दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।
खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसड़ भगति जाके उर माहीं।


जिसके हृदय में प्रभु की भक्ति प्रकट हो जाती है उसको सपने में भी दुःख नहीं सताता। उसके भीतरी और बाहरी दोनों प्रकार के शत्रु नष्ट हो जाते हैं।


सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥
प्यारे हनुमान जी ने भगवान श्री राम जी के पवित्र नाम
और रूप का खूब स्मरण किया जिसके कारण प्रभु उनके वश में हो गए।


प्रभु का नामे परम-पवित्र है। उसका जाप करने से मन
निर्मल होता है और निर्मल-मन से प्रभु का दर्शन होता है।
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।।
भक्ति का ऐसा प्रभाव है। प्रह्लाद के लिये विष अमृत बन गया। मीराबाई के लिये विष अमृत हो गया। इस कलिकाल में भक्ति का साधन सुगम और सरल है। सबको भगवान की भक्ति करनी चाहिये।


मीरा की दासी ने आकर कहा-मीरा प्रसाद की खीर
में विष मिला है, इसेमत पीना, तूमर जायेगी। मीरा ने कहा-
मीरा तो पहले ही मर चुकी है अब क्या मरेगी देह से मोह तो संसारी लोग करते हैं, भक्त जन नहीं। क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि देह का महत्व तभी तक है जब तक प्रभु को पाया नहीं। देह नाव के समान है। पार हो जाने के बाद नाव का क्या महत्व मीरा ने कहा-पगली, मीरा को कौन मार सकता है?

मीरा तो कृष्ण की है। प्रभु की वस्तु को उसकी इच्छा के बिना कोई छू भी नहीं सकता। विष और अमृत दो वस्तुएँ हैं। मैंने विष को देखना ही छोड़ दिया है। प्रभु के नाम और रूप के प्रभाव से मेरे परमात्मा ने मेरे रोम-रोम में भक्ति अर्थात् प्रेम अर्थात् अमृत भर दिया है। गंदी नाली का पानी अगर गंगा में मिल जाय तो वो भी गंगाजल बन जाता है तो क्या ये थोडा-सा जहर अमृत नहीं बन सकता


मरते वे हैं जिन्हें संसार चाहिये।जिनको परमात्मा चाहिये और जो ईश्वर के नाम और रूप का स्मरण करते हैं वे कभी नहीं मरते-वे सदा अमर रहते हैं। भक्त और भगवान एक ही हैं। वे सदा हमारा मार्ग-दर्शन करते रहते हैं।


भक्त के हृदय में शत्रु भाव नहीं होता। प्रह्लाद के पिता ने अपने ही पुत्र को अनेक कष्ट दिये, फिर भी प्रह्लाद ने अपने पिता को शत्रु नहीं माना और न ही उन्होंने भगवान से अपनी
रक्षा के लिये कहा।


भक्त का अर्थ है

भक्त का अर्थ है प्रेम से भरा हुआ। भरे हुए के अन्दर दूसरी वस्तु कैसे समा सकती है
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मन अनुसासन मानै जोई।।

भगवान कहते हैं:-

प्यारा और मेरा सेवक वह है जो
मेरी आज्ञा मानता है।

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