हिमाचल प्रदेश में संवैधानिक विकास तथा प्रशासनिक गठन।

हिमाचल प्रदेश में संवैधानिक विकास तथा प्रशासनिक गठन।

हिमाचल प्रदेश 15 अप्रैल 1948 को स्वतंत्र भारत की एक इकाई के रुप में अस्तित्व में आया। चार जिलों के इस प्रांत का शासन मुख्यायुक्त को सौंपा गया। श्री एन.सी. मेहता आई.सी.एस. पहले मुख्यायुक्त थे। आई.सी.एस. श्री ई. पैंडरल भून को उपमुख्यायुक्त नियुक्त किया गया। मुख्यायुक्त की सलाह के लिए 30 सितम्बर 1948 को नौ सदस्यों, जिनमें तीन भूतपूर्व शासक और 6 जनता के प्रतिनिष्टि (थे, इनकी एक सलाहकार समिति बनाई गई परन्तु उस समिति को -कोई अधिकार नहीं थे और इसके परामर्श का कोई बंधन नहीं था। मुख्यायुक्त स्वेच्छा से निर्णय ले सकता था। जन नेताओं को आशा थी कि संविधान सभा मुख्यायुक्त के अधीन प्रातों के लिए किसी प्रजातांत्रिक ढांचे का प्रावधान करेगी परन्तु उसने यह काम लोकसभा पर छोड़ दिया। अतः प्रदेश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो सकी। 

26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। इसके अनुसार हिमाचल प्रदेश 1951 ई. में “ग” भाग का राज्य बना परन्तु इसका शासन भी मुख्यायुक्त के अधीन रहा। 1950 में श्री ई. पैंडरल मून को प्रदेश का मुख्यायुक्त नियुक्त किया गया और पहले की तरह सलाहकार समिति की नियुक्ति की गई परन्तु उसकी सलाह पर कोई काम नहीं होता था जिसके कारण सदस्यों ने सलाहकार समिति से त्याग पत्र दे दिया। 

1951 में श्री मून के स्थान पर श्री भगवान सहाय को मुख्यायुक्त बनाया गया। डॉ. यशवंत सिंह परमार के नेतृत्व मैं हिमाचल प्रदेश के जनप्रतिनिधियों ने अन्य राज्यों के प्रतिनिधियों की सहायता से भारत सरकार को यह एहसास दिलाया कि “ग’ भाग के राज्यों में भी निर्वाचित सरकार होनी आवश्यक है। तदानुसार संसद द्वारा 1951 ई. में एक अधिनियम पारित किया गया जिसमें “ग” भाग के राज्यों में सीमित । अधिकारों से संपन्न निर्वाचित सरकारें स्थापित करने का प्रावधान किया गया। 

इस अधिनियम के अनुसार मुख्यायुक्त के स्थान पर उपराज्यपाल और एक 36 सदस्यी विधानसभा का प्रावधान हिमाचल प्रदेश के लिए किया गया। नवम्बर 1951 में विधानसभा की 36 सीटों के लिए चुनाव कराए गए, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नै 24 सीटें प्राप्त कर बहुमत प्राप्त किया। 29 दिसम्बर, 1953 को भारत सरकार ने राज्य पुनर्गठण आयोग स्थापित करने का निर्णय लिया और शीघ्र ही आयोग के सदस्यों की नियुक्ति कर दी। न्यायमूर्ति फाजिल अली इसके अध्यक्ष बने और श्री के. एम. प्राणिकर तथा एच.एन. कुजरु इसके दो सदस्य नियुक्ति किए गए। 

दिसम्बर 1956 में भारतीय संसद ने क्षेत्रीय परिषद्‌ विधेयक पारित किया जिसे जिला परिषद की भांति प्रदेश के लिए एक 41 सदसीय क्षेत्रीय परिषद्‌ (एढ्रतांगांश (.०फा्) का प्रावधान किया गया | मई-जून 1957 में इसके सदस्यों के निर्वाचन के लिए चुनाव हुए। इन चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को बहुमत मिला और 15 अगस्त, 1957 से परिषद्‌ ने अपना कार्यभार संभाला। इस परिषद्‌ में 41 में से 12 स्थान अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित थे। 2 सदस्य मनोनीत करने का अधिकार शष्ट्रपति को था। इस परिषद्‌ का कार्यकाल पांच वर्ष का था। परिषद्‌ की 2 महीने में कम से कम एक बैठक होनी जरूरी था। सदस्य बहुमत से अपना अध्यक्ष चुन सकते थे और दो तिहाई बहुमत पर उसे हटा भी सकते थे। एक उपाध्यक्ष का भी प्रावधान था जो अध्यक्ष की अनुपस्थिति में परिषद्‌ की कार्यवाही का संचालन करता था| 

प्रदेश विधानसभा गठन 

1962 में भारतीय संसद ने संविधान में चौदहवां संशोधन करने के बाद केन्द्रशासित प्रदेश अधिनियम 1963 पारित किया जिसके अनुसार केन्द्र शासित प्रदेशों में विद्यमान क्षेत्रीय परिषद्यों को विधानसभाओं में परिवर्तित कर दिया गया। 1 जुलाई 1963 को हिमाचल प्रदेश क्षेत्रीय परिष्साद्‌ को भी विधान सभा में बदल दिया गया | डॉ. यशवंत सिंह परमार पुनः विधानसभा बहुमत दल के नेता चुने गए और 1 जुलाई 1963 को वे दूसरी बार हिमाचल प्रदेशु के मुख्यमंत्री बने। 

1 सितम्बर 1965 में ब्वारत सरकार ने सरदार हुक्म सिंह की अध्यक्षता में पंजाब को भाषा के आधार पर पुन॑र्गठित करने हेतु सुझाव देने के लिए एक संसदीय समिति बनाई । इस समिति ने पंजाब को भाषा के आधार पर पुनर्गठित करने की सिफारिश की। तदानुसार न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में पंजाब पुनर्गठन आयोग की स्थापना की गई, जिसकी श्पट के आधार पर पंजाब और हरियाणा नामक दो प्रांतों का गठन किया गया। इस आयोग के सामने डॉ. यशवंत सिंह परमार के नेतृत्व में सरकार ने पहाड़ी भाषी क्षेत्र को हिमाचल प्रदेश में शामिल करने पर्‌ जोर दिया। 

1 नवम्बर, 1966 को कांगड़ा, शिमला, नालागढ़, डलहौजी, कुल्लु, लाहौल-स्पिति और होशियारपुर से ऊना दि के क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल किए और विशाल हिमाचल प्रदेश का गठन किया गया। विधानसभा सदस्यों की संख्या 41 के बजाए 68 हो गई। 1967 में जब चुनाव हुए तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 37 सीटें जीत करें बहुमत मिला। डॉ. यशवंत सिंह परमार पुनः हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 

. 24 जनवरी, 1968 को हिमाचल प्रदेश विधानसभा मे एकमत से एक प्रस्ताव पार्स करके पूर्ण राज्य का दर्जा द्विये जाने की मांग की। 1969 में हिमाचल प्रदेश के सांसदों ने भारतीय संसद में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने संबंधी एक गैर-सरकारी प्रस्ताव रखा जिसे संसद में भारी समर्थन मिला। इस पर केन्द्र सरकारमे अपनी नीति का पुनरावलोकन करके 3। जुलाई, 1970 को हिमाचल को पूर्ण राज्य इनाने की ससद में घोषणा कर दी। 

18 सितम्बर, 1970 को भारतीय संसद ने इस राज्य से संबधित इस विधेयक को एकमत से पारित कर दिया। 25 जनवरी, 1971 को श्रीमती इंदिरा गाघी ने शिमला मे रिज मैदान पर बर्फबारी के दौरान पूर्ण राजत्व की घोषणा की। श्री एस. चक्रवर्ती हिमाचल प्रदेश के पहले राज्यपाल नियुक्त हुए। डॉ. यशवंत सिंह पंरमार को हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। 

प्रदेश में इस समय 68 सदस्यीय विधानसभा है। जिसके सभी सदस्य निर्वाचित होकर सभा में प्रवेश करते हैं। लोग व्यस्क मताधिकार के आधार पर विधानसभा शदस्य चुनते हैं। संविधान की प्रांतीय सूची डे वर्णित सभी विषयों पर विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार है इसे लागू करने के लिए पहले राष्ट्रपति की स्वीकृति लेनी पड़ती है। विधान सभा बजट पारित करके प्रदेश के आर्थिक ढांचे पर थी नियत्रण रखती है। कर आदि भी विधानसभा की स्वीकृति से ही लगाए जा सकते हैं क्योंकि मत्री मंडल अपने कार्यों के लिए बिधानसभा के प्रति उत्तरदायी होता है। विधानसभा शासन पर भी नियंत्रण रखती है। हिमाचल प्रदेश में जिलावार विधानसभा क्षेत्रों का अध्ययन निम्न प्रकार से किया ज़ा सकता है : 

हिमाचल प्रदेश में जिलावार विधानसभा ‘ 

जिला विधानसभा क्षेत्र 

1. ऊना

 1. ऊना, 2. सतोषगढ, 3. कुटलैहड़, 4.गगरेट (आरक्षित), 5. चिन्तपूर्णी | 

2. कांगड़ा 

1. ज्वालामुखी, 2. प्रागपुर (आरक्षित), 3. जसवां, 

4. ज्वाली, 5. फतेहपुर, 6 मूरपुर, 7. शाहपुर, 8. धर्मशात्रा 9. कांगड़ा, 10.पालमपुर, 11 ईन्दौरा (आरक्षित), 12. सुलह, 13. देहरा, 14. बैजनाथ (आरक्षित), 15. नगरोटा। 

3. कुल्लु 

1. कुल्लु , 2. बंजार, 3.आनी (आरक्षित), 4.मनाली। 

4. किन्‍नौर 

1.किन्नौर, (अनूसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित) 

5.चंबा

1. भटियात, 2.डल्हौजी, 3. चंबा, 4. चुराह (आरक्षित), 

5. भरमौर (आरक्षित)। 

6. बिलासपुर 

1. बिलासपुर सदर, 2. श्री नैना देवी, 3. घुमारवीं 4.झंडूता (आरक्षित) 

7. मण्डी

1.करसोग(आरक्षित), 2. सराज, 3.सुंदरनगर, 4.बल्ह(आरक्षित),5 दरग 6.सरकाघाट, 7. जोगिन्दर 8. धर्मपुर 9. नाचन (आरक्षित), 10. मण्डी, 

8) लाहौल-स्पिति 

1.लाहौल-स्पिति, (आरक्षित अनुसूचित जनजाति)। 

9. शिमला 

1. रामपुर, (आरक्षित) 2.रोहडू, 3.जुब्बलकोटखाई, 4. ठियोग, 5.चौपाल, 6. शिमला ग्रामीण, 7. कसुम्पटी 8. शिमला शहरी। 

10. सिरमोर 

1.पछाड़ (आरक्षित) 2. रेणुका (आरक्षित) 3,शिलाई, &. पौंटा साहिब, | नाहन।

11.सोलन 

1.दून, 2.नालागढ़, 3.कसौली (आरक्षित), 4.अर्की, 5. सोलन (आरक्षित । 

12.हमीरपुर 

1. हमीरपुर, 2. सुजानपुर, 3.भोरंज (आरक्षित), 4.नदौन, 5. बडसर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *